क्या तुम ज़िन्दगी से ऊब चुके हो? तो फिर खुद को किसी ऐसे काम में झोंक दो जिसमे दिल से यकीन रखते हो, उसके लिए जियो, उसके लिए मरो, और तुम वो ख़ुशी पा लोगे जो तुम्हे लगता था की कभी तुम्हारी नहीं हो सकती. - kya tum zindgi se oob chuke ho. to fir khud ko kisi ese kaam me jhonk do jise tum dil se chahte ho aur tum wo khushi paa loge jo tum sochte the ki tumhari kabhi nahi ho sakti : डेल कार्नेगी

क्या तुम ज़िन्दगी से ऊब चुके हो? तो फिर खुद को किसी ऐसे काम में झोंक दो जिसमे दिल से यकीन रखते हो, उसके लिए जियो, उसके लिए मरो, और तुम वो ख़ुशी पा लोगे जो तुम्हे लगता था की कभी तुम्हारी नहीं हो सकती. : Kya tum zindgi se oob chuke ho. to fir khud ko kisi ese kaam me jhonk do jise tum dil se chahte ho aur tum wo khushi paa loge jo tum sochte the ki tumhari kabhi nahi ho sakti - डेल कार्नेगी

अपने काम से प्यार करो पर अपनी कार्यस्थल से प्यार मत करो क्योकि आप नहीं जानते की कब आपकी कम्पनी आपको प्यार करना बंद कर दे - apne kaam se pyar karo apne karyasthal se nahi kyonki aap nahi jante ki kab aapki company aapko pyar karna band kar de. : ए पी जे अब्दुल कलाम

अपने काम से प्यार करो पर अपनी कार्यस्थल से प्यार मत करो क्योकि आप नहीं जानते की कब आपकी कम्पनी आपको प्यार करना बंद कर दे। : Apne kaam se pyar karo apne karyasthal se nahi kyonki aap nahi jante ki kab aapki company aapko pyar karna band kar de. - ए पी जे अब्दुल कलाम

संसार में हर वस्तु में अच्छे और बुरे दो पहलू हैं, जो अच्छा पहलू देखते हैं वे अच्छाई और जिन्हें केवल बुरा पहलू देखना आता है वह बुराई संग्रह करते हैं - sansaar me har vastu ke do pahloo hain jo achcha pahloo dekhte hain ve achchai aur jo bura pahloo dekhte hain ve burai ka sangrah karte hain. : प्रज्ञा सुभाषित

संसार में हर वस्तु में अच्छे और बुरे दो पहलू हैं, जो अच्छा पहलू देखते हैं वे अच्छाई और जिन्हें केवल बुरा पहलू देखना आता है वह बुराई संग्रह करते हैं। : Sansaar me har vastu ke do pahloo hain jo achcha pahloo dekhte hain ve achchai aur jo bura pahloo dekhte hain ve burai ka sangrah karte hain. - प्रज्ञा सुभाषित

हमारी सोच और हमारा व्यवहार हमेशा किसी प्रतिक्रिया की आशा में होते हैं। इसलिए ये डर पर आधारित हैं - hamari soch aur hamara vyavhaar hamesha kisi pratikriya ki aasha me hote hain isliye ye dar par aadharit hote hain. : दीपक चोपड़ा

हमारी सोच और हमारा व्यवहार हमेशा किसी प्रतिक्रिया की आशा में होते हैं। इसलिए ये डर पर आधारित हैं। : Hamari soch aur hamara vyavhaar hamesha kisi pratikriya ki aasha me hote hain isliye ye dar par aadharit hote hain. - दीपक चोपड़ा