मानव को अपने पल-पल को ‘आत्मचिन्तन’ मे लगाना चाहिए, क्योंकि हर क्षण हम ‘परमेश्वर’ द्वारा दिया गया ‘समय’ खो रहे है - manav ko pal pal aatmachintan me lagana chahiye kyonki har kshan hum parmehswdwara diya gaya samay kho rahe hain. : महर्षि दयानंद सरस्वती

मानव को अपने पल-पल को ‘आत्मचिन्तन’ मे लगाना चाहिए, क्योंकि हर क्षण हम ‘परमेश्वर’ द्वारा दिया गया ‘समय’ खो रहे है। : Manav ko pal pal aatmachintan me lagana chahiye kyonki har kshan hum parmehswdwara diya gaya samay kho rahe hain. - महर्षि दयानंद सरस्वती

अगर ‘मनुष्य’ का मन ‘शाँन्त’ है, ‘चित्त’ प्रसन्न है, ह्रदय ‘हर्षित’ है, तो निश्चय ही ये अच्छे कर्मो का ‘फल’ है - agar manushya ka man shant hai, chitta prasanna hai hriday harshit hai to nishchaya hi yah achche karmo ka fal hai. : महर्षि दयानंद सरस्वती

अगर ‘मनुष्य’ का मन ‘शाँन्त’ है, ‘चित्त’ प्रसन्न है, ह्रदय ‘हर्षित’ है, तो निश्चय ही ये अच्छे कर्मो का ‘फल’ है। : Agar manushya ka man shant hai, chitta prasanna hai hriday harshit hai to nishchaya hi yah achche karmo ka fal hai. - महर्षि दयानंद सरस्वती

संस्कार ही ‘मानव’ के ‘आचरण’ का नीव होता है, जितने गहरे ‘संस्कार’ होते हैं, उतना ही ‘अडिग’ मनुष्य अपने ‘कर्तव्य’ पर, अपने ‘धर्म’ पर, ‘सत्य’ पर और ‘न्याय’ पर होता है - sanskar hi maanav ke acharan ki neev hota hai. sanskar jitna gahra hota hai utna hi adig manushya apne kartavya par apne dharm par satya par aur nyay par hota hai. : महर्षि दयानंद सरस्वती

संस्कार ही ‘मानव’ के ‘आचरण’ का नीव होता है, जितने गहरे ‘संस्कार’ होते हैं, उतना ही ‘अडिग’ मनुष्य अपने ‘कर्तव्य’ पर, अपने ‘धर्म’ पर, ‘सत्य’ पर और ‘न्याय’ पर होता है। : Sanskar hi maanav ke acharan ki neev hota hai. sanskar jitna gahra hota hai utna hi adig manushya apne kartavya par apne dharm par satya par aur nyay par hota hai. - महर्षि दयानंद सरस्वती

ईष्या से मनुष्य को हमेशा दूर रहना चाहिए। क्योकि ये ‘मनुष्य’ को अन्दर ही अन्दर जलाती रहती है और पथ से भटकाकर पथ भ्रष्ट कर देती है - irshya se manushya ko door rahna chahiye kyonki yah manushya ko andar hi andar jalaati rehti hai aur pathbhrashta kar deti hai. : महर्षि दयानंद सरस्वती

ईष्या से मनुष्य को हमेशा दूर रहना चाहिए। क्योकि ये ‘मनुष्य’ को अन्दर ही अन्दर जलाती रहती है और पथ से भटकाकर पथ भ्रष्ट कर देती है। : Irshya se manushya ko door rahna chahiye kyonki yah manushya ko andar hi andar jalaati rehti hai aur pathbhrashta kar deti hai. - महर्षि दयानंद सरस्वती

मोह वह अत्यंत विस्मृत जाल है जो बाहर से अत्यंत सुन्दर और अन्दर से अत्यंत कष्टकारी है , जो इसमें फंसा वो पूरी तरह उलझ गया - moh atyant vismrit jal hai jo bahar se atyant sundar jabki anadar se atyant kashtkaari hai. jo isme fansa poori tarah ulajh gaya. : महर्षि दयानंद सरस्वती

मोह वह अत्यंत विस्मृत जाल है जो बाहर से अत्यंत सुन्दर और अन्दर से अत्यंत कष्टकारी है , जो इसमें फंसा वो पूरी तरह उलझ गया : Moh atyant vismrit jal hai jo bahar se atyant sundar jabki anadar se atyant kashtkaari hai. jo isme fansa poori tarah ulajh gaya. - महर्षि दयानंद सरस्वती