जिसके पास कुछ भी कर्ज नहीं, वह बड़ा मालदार है - jinke paas kuchh bhi karj nahi, vah made maaldaar hain. : प्रज्ञा सुभाषित
जो महापुरुष बनने के लिए प्रयत्नशील हैं, वे धन्य है - jo mahapurush banne ke liye prayatnasheel hain, ve dhanya hain. : प्रज्ञा सुभाषित
अज्ञान और कुसंस्कारों से छूटना ही मुक्ति है - agyan aur kusanskaro se chhotna hi mukti hai. : प्रज्ञा सुभाषित
जो जैसा सोचता और करता है, वह वैसा ही बन जाता है - jo jaisa sochta hai, vah waisa hi ban jata hai. : प्रज्ञा सुभाषित
अज्ञानी वे हैं, जो कुमार्ग पर चलकर सुख की आशा करते हैं - agyani ve hain jo kumarg par chalakar sukh ki aasha karte hain. : प्रज्ञा सुभाषित
विवेक और पुरुषार्थ जिसके साथी हैं, वे ही प्रकाश प्राप्त करेंगे | - vivek aur purusharth jiske sathi hai, wahi prakash prapt karenge. : प्रज्ञा सुभाषित
जो प्रेरणा पाप बनकर अपने लिए भयानक हो उठे, उसका परित्याग कर देना ही उचित है - jo prerna paap bankar apne liye bhayanak ho uthe, uska parityaag kar dena hi uchit hai. : प्रज्ञा सुभाषित
सत्य एक ऐसी आध्यात्मिक शक्ति है, जो देश, काल, पात्र अथवा परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होती - satya ek aisi adhyatmik shakti hai. jo desh kaal patra athva paristhitiyon se prabhavit nahi hoti. : प्रज्ञा सुभाषित
सब कुछ होने पर भी यदि मनुष्य के पास स्वास्थ्य नहीं, तो समझो उसके पास कुछ है ही नहीं - sab kuchh hone par bhi yadi manushya ke paas swasthya nahi hai to samjho uskie paas kuchh nahi hai. : प्रज्ञा सुभाषित
बुराई मनुष्य के बुरे कर्मों की नहीं, वरन् बुरे विचारों की देन होती है - buraai manushya ke buro karmo ki nahi, varan bure vicharo ki den hoti hai. : प्रज्ञा सुभाषित
जो बच्चों को सिखाते हैं, उन पर बड़े खुद अमल करें, तो यह संसार स्वर्ग बन जाय - jo bachcho ko sikhate hain, un par khud amal karein to yah sansar swarg ban jaye. : प्रज्ञा सुभाषित
जीवन का अर्थ है समय। जो जीवन से प्यार करते हों, वे आलस्य में समय न गँवाएँ - jeevan ka arth hai samay. jo jeevan se pyar karte hain ve alasya me samay na ganvaate. : प्रज्ञा सुभाषित
जिसने जीवन में स्नेह, सौजन्य का समुचित समावेश कर लिया, सचमुच वही सबसे बड़ा कलाकार है - jisne jeevan me sneh saujanya ka samuchit samavesh kar liya, sachmuch hi vah sabse bada kalakar hai. : प्रज्ञा सुभाषित
यथार्थ को समझना ही सत्य है। इसी को विवेक कहते हैं - yatharth ko samjhna hi satya hai . isi ko vivek kahte hain. : प्रज्ञा सुभाषित
महात्मा वह है, जिसके सामान्य शरीर में असामान्य आत्मा निवास करती है - mahatma vah hai jiske samanya shareer e asamanya aatma nivaas karti hai. : प्रज्ञा सुभाषित
निश्चित रूप से ध्वंस सरल होता है और निर्माण कठिन है - nishchit roop se dhwans saral hota hai aur nirmaan kathin. : प्रज्ञा सुभाषित
नेतृत्व पहले विशुद्ध रूप से सेवा का मार्ग था। एक कष्ट साध्य कार्य जिसे थोड़े से सक्षम व्यक्ति ही कर पाते थे - netritva ka vishuddha roop seva ka marg tha, ek kasht sadhya karya jise thode se sksham vyakti hi kar paate the. : प्रज्ञा सुभाषित
समाज का मार्गदर्शन करना एक गुरुतर दायित्व है, जिसका निर्वाह हर कोई नहीं कर सकता - samaj ka -margdarshan karna ek guruttar daayitva hai, jiska nirvaah har koi nahi kar sakta . : प्रज्ञा सुभाषित
जो टूटे को बनाना, रूठे को मनाना जानता है, वही बुद्धिमान है - jo toote ko banan aur roothe ko manana jaanta hai vahi buddhiman hai. : प्रज्ञा सुभाषित
अस्त-व्यस्त रीति से समय गँवाना अपने ही पैरों कुल्हाड़ी मारना है - ast vyast reeti se samay ganvaana apne hi pairo par kulhadi maarne jaisa hai. : प्रज्ञा सुभाषित
किसी आदर्श के लिए हँसते-हँसते जीवन का उत्सर्ग कर देना सबसे बड़ी बहादुरी है - kisi aadarsh ke liye hanste hanste jeevan ka utsarg kar dena sabse badi bahaduri hai. : प्रज्ञा सुभाषित
नरक कोई स्थान नहीं, संकीर्ण स्वार्थपरता की और निकृष्ट दृष्टिकोण की प्रतिक्रिया मात्र है - narak koi sthan nahi, sankeerna swarthparta ki or nikrishta drishtikon ki pratikriya matra hai. : प्रज्ञा सुभाषित
ईमानदार होने का अर्थ है-हजार मनकों में अलग चमकने वाला हीरा - imaandar hone ka arth hai hazaro manko mer alag chamkane wala heera. : प्रज्ञा सुभाषित
वही उन्नति कर सकता है, जो स्वयं को उपदेश देता है - vahi unati kar sakta hai jo swayam ko updesh deta hai. : प्रज्ञा सुभाषित
संसार में हर वस्तु में अच्छे और बुरे दो पहलू हैं, जो अच्छा पहलू देखते हैं वे अच्छाई और जिन्हें केवल बुरा पहलू देखना आता है वह बुराई संग्रह करते हैं - sansaar me har vastu ke do pahloo hain jo achcha pahloo dekhte hain ve achchai aur jo bura pahloo dekhte hain ve burai ka sangrah karte hain. : प्रज्ञा सुभाषित