प्रस्तुत उलझनें और दुष्प्रवृत्तियाँ कहीं आसमान से नहीं टपकीं। वे मनुष्य की अपनी बोयी, उगाई और बढ़ाई हुई हैं।

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प्रस्तुत उलझनें और दुष्प्रवृत्तियाँ कहीं आसमान से नहीं टपकीं। वे मनुष्य की अपनी बोयी, उगाई और बढ़ाई हुई हैं। : Prastut uljhane aur dushpravrittiyan kahin aasman se nahi tapkee. ve manushya ki apni boyi, ugaai aur badhaayi hui hain. - प्रज्ञा सुभाषितप्रस्तुत उलझनें और दुष्प्रवृत्तियाँ कहीं आसमान से नहीं टपकीं। वे मनुष्य की अपनी बोयी, उगाई और बढ़ाई हुई हैं। : Prastut uljhane aur dushpravrittiyan kahin aasman se nahi tapkee. ve manushya ki apni boyi, ugaai aur badhaayi hui hain. - प्रज्ञा सुभाषित

prastut uljhane aur dushpravrittiyan kahin aasman se nahi tapkee. ve manushya ki apni boyi, ugaai aur badhaayi hui hain. | प्रस्तुत उलझनें और दुष्प्रवृत्तियाँ कहीं आसमान से नहीं टपकीं। वे मनुष्य की अपनी बोयी, उगाई और बढ़ाई हुई हैं।

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